इमरजेंसी में अपनी जान बचाना जानते हैं आप?

  • माइकल बॉन्ड
  • 'द पॉवर ऑफ़ अदर्स' के लेखक
मुसीबत के समय सही ढंग से सोचना बेहद ज़रूरी है

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आपदा के समय ज़्यादातर लोग वो अहम काम करने में असफल रहते हैं जो उनकी जान बचा सकता है.

लेकिन ऐसा क्यों होता है ? इसका जवाब खोजते समय 27 सितंबर 1994 की उस घटना पर ध्यान देना चाहिए जिसमें 852 लोग समुद्र में डूब गए थे.

उस दिन सुबह सात बजे समुद्री जहाज़ एमएस एस्टोनिया 989 मुसाफ़िरों को लेकर तालिन बंदरगाह से रवाना हुआ. उसे बाल्टिक सागर पार कर स्टॉकहोम जाना था. पर जहाज़़ कभी वहाँ नहीं पंहुचा.

बंदरगाह छोड़ने के छह घंटे बाद जहाज़ ज़बरदस्त तूफ़ान में फंस गया, इसके सामने का दरवाज़ा टूट गया और पानी तेज़ी से अंदर घुसने लगा.

घंटे भर में जहाज़ डूब गया और इसके साथ ही डूब गए 852 यात्री और जहाज़ का चालक दल.

क्यों डूबे 852 लोग?

त्रासदी घटने की गति, समुद्री तूफ़ान, जहाज़ डूबने के आधे घंटे बाद आपात स्थिति की घोषणा और बचाव दल का प्रभावित लोगों तक पंहुचने का समय...इन सभी बातों को देखते हुए भी राहत विशेषज्ञ इतने अधिक लोगों के मरने से दंग रह गए. ऐसा लगता है कि कई लोग सिर्फ़ इसलिए डूब गए कि उन्होंने बचने की कोई कोशिश ही नहीं की.

एक अधिकारिक रिपोर्ट में कहा गया, “ऐसा लगता है कि भयभीत होने के कारण कई लोग सोचने-समझने या ज़रूरी कार्रवाई करने की क्षमता ही खो बैठे.

कई लोग तो इतने डर गए कि उन्हें ज़बरन भी बाहर नहीं निकाला जा सका. कई लोग इस कदर सदमे में थे कि दूसरे मुसाफ़िरों ने जब उन्हें रास्ता दिखाना चाहा तो वे हिल ही नहीं पाए, कोई कार्रवाई कर ही नहीं पाए, तब भी नहीं जब उन पर चीखा-चिल्लाया गया.”

आख़िर हुआ क्या था?

एक व्यक्ति जो इसका जवाब दे सकते हैं, वो हैं जॉन लीच.

वे पोर्ट्समाउथ विश्वविद्यालय में विकट स्थितियों में लोगों के व्यवहार पर शोध कर रहे हैं.

उन्होंने दुनिया भर में कई दशकों में हुई दर्जन भर त्रासदियों का अध्ययन किया है. वे ऐसी ही एक दुर्घटना 1987 में 18 नवंबर को लंदन के किंग्ज़ क्रॉस मेट्रो स्टेशन पर आग लगने के समय मौजूद थे.

इस आग में 31 लोग मारे गए थे. लीच ने पाया कि जानलेवा स्थितियों में लगभग 75 फ़ीसदी लोग न तो ठीक से सोच पाते हैं और न ही जान बचाने का कोई उपाय ढूंढते हैं.

सिर्फ़ 15 प्रतिशत लोग इतने शांत रहते हैं कि वे ठीक से सोच सकें ताकि बचने का उपाय खोजा जा सके. दस फ़ीसदी लोग तो ऐसे संकट में बौख़ला कर इतने ख़तरनाक हो जाते हैं कि वे अन्य लोगों के बच निकलने की संभावना कम कर देते हैं.

किसकी जान बचती है?

आख़िर उन 15 प्रतिशत लोगों में क्या खूबी होती है जो जानलेवा संकट के समय ठीक से सोच समझ पाते हैं और ज़रूरी कार्रवाई करते हुए बच नकलते हैं.

लीच कहते हैं कि यह सवाल ही ग़लत है. प्रश्न तो यह उठता है कि जो लोग बच सकते थे वे क्यों मारे जातें है जबकि उनके बचने के तमाम उपाय मौजूद रहते हैं.

मुसीबत में बनाए रखें मानसिक संतुलन

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सवाल यह भी है कि इतने सारे लोग संकट के समय बदलती स्थिति के मुताबिक अपने को क्यों नहीं ढाल पाते और हार क्यों मान लेते हैं?

लीच कहते हैं, "जान बचाने के लिए ऐसा नहीं कि किसी ख़ास हुनर की ज़रूरत हो. आपको पता सिर्फ़ ये होना चाहिए करना क्या है?

वे कहते हैं, "लड़ाई के दौरान बचने के उपाय बताने वाले विशेषज्ञ के रूप में मेरा काम लोगों को ये सिखाना है कि मौत से कैसे बचना है.”

आपात स्थिति में हरकत में देरी

आपात स्थिति में लोग दरअसल क्या करते हैं, ये साफ़ नहीं है?

बचाव के लिए प्रोसीजर बनाते समय इंजीनियर यह मान कर चलते हैं कि लोग तत्काल हरकत में आते हैं.

वे मानते हैं कि अलार्म सुन कर या धुंए कों सूंघ कर या नाव के डोलने के बाद लोग तुरंत प्रतिक्रिया करेंगे.

असलियत यह है कि कई दशकों में हुई घटनाओं में देखा गया है कि असली चुनौती ही लोगों को जल्द बरकत में लाने की है.

22 अगस्त 1985 को कोर्फ़ू जाने वाला बोईंग 737 जहाज़ मैनचेस्टर हवाई अड्डे पर उड़ान भरने ही वाला था कि इसका इंजन ख़राब हो गया.

ब्रिटिश सरकार की हवाई दुर्घटना जांच शाखा ने अपनी रिपोर्ट में कहा, “सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जहाज़ ने उड़ान भरी भी नहीं थी कि उसे रोक दिया गया और उसमें लगी आग को बुझाने की पूरी कोशिश की गई. फिर भी 55 लोगों की मौत हो गई. बड़ा सवाल तो यह है कि मुसाफ़िर आख़िर क्यों ज़ल्दी ज़ल्दी बाहर नहीं निकल पाए.”

लोगों को असली ख़तरा बाहर निकलने के लिए पागलपन दिखाने या जानवरों की तरह भगदड़ करने से नहीं, बल्कि उनकी ज़ल्दबाज़ी करने की अनिच्छा में था.

9/11 - कई ईमेल भेजते रहे

लोगों की निष्क्रियता का सबसे सटीक उदाहरण न्यू यॉर्क के ट्विन टावर पर 9/11 को हुए हमले के दौरान देखा गया.

आप सोच रहे होंगे कि जो लोग पहले विमान के इमारत से टकराने के बाद बच गए होंगे वे जल्द से जल्द निकटतम एक्ज़िट की ओर भागे होंगे.

सच्चाई ये है कि अधिकतर लोगों ने इसके उलट किया, मानो, वे इमारत से बाहर नहीं निकलने के बहाने ढूंढ रहे हों.

अमरीका के नेश्नल इंस्टीच्यूट ऑफ़ स्टैंडर्ड्स एंड टेक्नोलॉजी के मुताबिक बच कर बाहर निकले लोगों ने सीढ़ी तक पहुँचने के लिए औसतन छह मिनट लगाए.

कुछ लोग तो आधे घंटे तक इसी उधेड़बुन में रहे कि क्या किया जाए. वे यही सोचते रहे कि देखें आगे क्या होता है और दूसरों के पहले निकलने का इंतजार करते रहे.

अध्ययन में पाया गया कि बच निकलने वाले लोग फ़ोन करते रहे, दराज़ो में चीजें रखते रहे या अपने दफ़्तर को ताला लगाते रहे. कई लोगों ने तो ईमेल किया, कंप्यूटर बंद किया, जूते बदले. कई लोग तो टॉयलेट भी गए. साईकिल से दफ़्तर आने वाली एक महिला ने तो यहां तक किया कि वो वापस दफ़्तर में गई और बाहर निकलने से पहले उसने अपने ऑफ़िस जाकर ट्रैकसूट पहना.

इस तरह की निष्क्रियता, ढीलापन या संकट के समय भी सामान्य तौर पर काम करते रहना के व्यवहार की मनोवैज्ञानिक व्याख्या है - तेज़ी से बदलती स्थित में ख़ुद को ढ़ाल पाने में असफल रहना या जान बचाने के लिए लक्ष्य निर्धारित कर उस तरह से बर्ताव करने की असमर्थता.

मनोवैज्ञानिक जॉन लीच के मुताबिक़, इसकी वजह यह है कि घटनाक्रम इतनी तेज़ी से होते हैं कि आप दिमाग उनसे निपट नहीं पाता. उपाय सोचने की क्षमता से कहीं अधिक तेज़ी से घटनाएं घटती हैं.

ज़्यादा तैयार लोग बचते हैं

इंडियाना विश्वविद्यालय के जेरम चर्टकॉफ़ कहते हैं, “जान खतरे में पड़ जाए तो भावनाएं तेज़ी से उठती हैं, नतीजतन, बचने के जितने उपाय सूझने चाहिए, उतने सूझते नहीं हैं. क्या किया जाए, यह सोचने के मामले में यह ख़तरनाक हो सकता है, क्योंकि हो सकता है कि आप बचने के सबसे सही उपाय के बारे में सोच ही नहीं पाएँ.”

जॉन लीच कहते हैं, “मैं जब कभी समुद्री ज़हाज़ से जाता हूं, सबसे पहले दखता हूं कि लाइफ़ बोट कहां रखे हुए हैं. ज़रूरत पड़ने पर मुझे केवल हरकत में आना होगा, इस बारे में सोचना नहीं होगा.”

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जानलेवा संकट की स्थिति में जो लोग अपनी जान बचा पाते हैं वो ज़रूरी नहीं कि और लोगों से ज़्यादा बहादुर या साहसी होते हैं. वो इसलिए अपनी जान बचा पाते हैं क्योंकि वे इसके लिए बेहतर तैयार होते हैं...

आपसी मदद की मानसिकता

एक दूसरा उदाहरण लें. 7 जुलाई 2005 को लंदन अंडरग्रांउड ट्रेन पर हुए हमले में 52 लोग मारे गए थे और 700 जख़्मी हुए थे.

ससेक्स विश्वविद्यालय के जॉन ड्ररी औ सेंट एंड्र्यूज़ विशविद्यालय के स्टीव रीखर ने वारदात में बचे लोगों से बात करने के बाद एक रिपोर्ट दी थी.

उनके मुताबिक़, कई घंटे तक धुँए भरी सुरंग में फँसे लोगों को नहीं पता था कि उन्हें बचाने कोई आएगा या नहीं. उन्हें यह भी पता नहीं था कि कहीं कोई और विस्फोट तो नहीं होंगे.

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पर इस अफ़रातफ़री के बीच ज़्यादातर लोगों का रवैया सहयोग और मदद करने का था. मनोवैज्ञानिकों ने इसकी व्याख्या इस रूप में की है कि ख़तरे के समय लोगों की मानसिकता एक दूसरे की मदद करने की है.

सभी की प्रतिक्रिया एक-सी नहीं

ब्रिटिश-आइरिश अटलांटिक ओडैसी के नौकायन दल ने 2012 के जनवरी में पूर्व से पश्चिम जाते हुए पूरे महासागर को 30 दिनों में पार करने की योजना बनाई थी.

28 दिनों बाद जब वे अपने गंतव्य स्थान बारबडोस से तक़रीबन 800 किलोमीटर दूर थे, एक लहर के झटके से नौका पलट गई और डूबने लगा.

नौकायन दल के साथ सवार ब्रॉडकास्टर मार्क बॉमंट के मुताबिक वो सभी डूब जाते यदि दल के कई सदस्यों ने गोते लगा कर जीवनरक्षक तख़्ती, इमरजेंसी लाइट, सैटेलाइट फ़ोन, जीपीएस ट्रैकर, खाने पीने का सामान न निकाला होता.

मार्क बॉमंट के अनुसार दल के दो लोगों को काफ़ी बड़ा झटका लगा और उनमें से एक तो बिल्कुल चुप हो गया और उसके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला.

ख़ुद से एक सवाल पूछें

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संभव है कि आप किसी जानलेवा मुसीबत में पड़ेंगे ही नहीं. पर बेहतर है कि आप यह कल्पना करें कि आप पर संकट आ सकता है.

ऐसे में बिना बौख़लाए आप पहले से ही तैयार हो सकते हैं.

मनोवैज्ञानक जॉन लीच का कहना है, "आपको करना सिर्फ़ इतना है कि अपने आप से एक आसान सवाल पूछें - 'यदि कुछ हो ही जाए तो मेरी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी?' यदि आपके पास इस सवाल का जवाब है तो बाकी सब अपने आप ठीक हो जाएगा.”

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